अलग मज़ा है

किसी पे मर के जीने का अलग मज़ा है।
जीना हो यार के बिना तो एक कज़ा है।

बहुत मुश्किल है इश्क़ की राहें जाना
लोगों की बात तो ये बिल्कुल बज़ा है।

दर्द अब इतना अहम है मेरी लिए यारा
जिंदगी इसके बिना तो बेमज़ा है।

बात बात पर रूठते क्यों रहते हो तुम
जानते हो ,तेरा रूठना एक सज़ा है।

मिले जो जब से तुम, सजदे में हूं मैं
इसमें भी कोई ,खुदा ही की रज़ा है।

सुरिंदर कौर

इंतज़ार

आंखों को किसी का इंतजार था।
न चाहते हुए भी दिल बेकरार था।

तिश्रगी मेरी कभी कम न हो सकी
राह में वैसे बहता आबशार था।

दवा नहीं तो दुआ ही तुम करते
आखिर को मैं तुम्हारा बीमार था।

इतने बेदर्द तुम क्यों हुये जाते हो
सोचो कभी मैं तेरा ग़मगुसार था।

अंधेरों से अब डर कैसा है ऐ दिल
छाती पर इनके सवेरा सवार था।

सुरिंदर कौर

दिल जलाने लगे हैं

कुछ दोस्तो का दिल वो जलाने लगे है।
एक नया रिशता वो हमसे बनाने लगे है।

बहुत दिनो से रख रहे है हम पर नजर
जैसे हम उनको कुछ दीवाने लगे है।

रोक टोक करते है वो बात बात पर
जैसे किसी को वो अब तरसाने लगे है।

अगर ये मोहब्बत है तो अल्लाह बचाना
संभलने मे हमे पहले ही जमाने लगे है।

, Surinder Kaur

ख़लिश थी दिल में

ख़लिश थी दिल में, लहज़ा मगर नरम रखा।
तेरे बिछड़ने के बाद ,तेरे होने का भरम रखा

दुश्वारियां कितनी भी रही ,जीवन में आती
सजदे में रहूं ,बस इतना सा मैंने धर्म‌ रखा ।

जम रही थी , खामोशी की बर्फ रिश्तों पर
बात करके मैंने ,एक एहसास सा गर्म रखा।

निकला ढूंढने एक रूह ,शाद करने को मन
वो शख्स जिसने ,भोगने को था हरम रखा।।

सब मसरुफ़ थे कलियों को गुलाब देने में
हमने कांटों से इश्क करना ही कर्म रखा।

सुरिंदर कौर

जिंदगी का इशारा

समझिए ज़रा जिंदगी का इशारा।
थोड़ा तो तुम पर , हक है हमारा।

बात बेबात रूठना तेरा सनम
दिल मेरे को नहीं है गवारा।

क्यू बैठे हो आंखे बंद करके
हसीं मौसम ने मिलेगा दुबारा।

लुटा रहा है कोई आज तारे
भर लाओ तुम दामन तुम्हारा।

जी लो जिंदगी जैसे भी चाहो
खुद बनो ,खुद का सहारा।

मंजिल की तरफ पांव बढ़ा
समझ न खुद को, तू बेचारा।

सुरिंदर कौर

इंतज़ार क्यों रहता है

इंतज़ार क्यों रहता है

हर शाम इंतजार सा क्यों रहता है?
दिल मेरा बेकरार सा क्यों रहता है?

क्यों अजब सी ख़लिश बेचैन करें ?
दिन पूरा सोगवार सा क्यों रहता है?

क्यों धूंआ धूंआ हो गई चाहतें मेरी?
दिल मेरा बेज़ार सा क्यों रहता है?

आहटें हैं ,मगर दस्तक क्यों नहीं कोई
दिल लेकिन बीमार सा क्यों रहता है?

ज़ेहन में भटकते हैं सिर्फ ख्याल तेरे
मुझ पर तेरा इख्तियार क्यों रहता है?

जचता नहीं कोई अब इन आंखों को
दिल मेरा, तेरा तलबगार क्यों रहता है?

Surinder Kaur

तुम्हारी बातों म

तुम्हारी बातों में दिल आ गया था।
तेरा बात करना हमें भा गया था।

तेरे लहज़े ने जब से ठगा दिल को
कोई बहुत याद आ गया था।

मीठी बातों का ऐसा जाल फेंका
बातों से ही मुझे बहला गया था।

बर्बाद होने के तो ,तरीके बहुत थे
मगर बस इश्क को चुना गया था।

झूठ बोलने को जुबां जरूरी है
सच आंखों से कहा गया था।

हुनर ऐसा हमें भी सिखला जाते
कैसे हमको भुलाया गया था।

बड़ी मुश्किल है राह ए इश्क
कितनी बार समझाया गया था।

सुरिंदर कौर

भूल गया

भूल गया दिल वो‌ सब भी।
कांटा सा चुभता मगर,अब भी।

मिलना बिछड़ना चलता रहता
सांसें रवां है तन में जब भी।

बात जब भूलने की करते हैं
याद हम करते हैं तब भी।

आंखें जब बोलने लग जाते
कांपने लगते हैं लब‌ भी।

क्यू मतलब से याद करते हो
कभी याद करो बेसबब भी।

Surinder

घर

Es pic pe kuch likha maine

घर पे घर, और कितने घर।
आदमी फिर भी दर ब दर।

बोझ ख्वाहिशें का सीने पर
दब नीचे न जाऊँ मैं मर।

कंकरीट का जंगल उगाया
कहूँ कैसे, पेड़ छाँव कर।

भीड़ लगी हर रहगुज़र पे
हर शख्स है तन्हा पर।

इन घरों को बनाने वाले
बाहर है मिलते अक्सर।

भागमभाग लगी है हर पल
रख ले थोड़ा तू सब्र।

मिटता जाता प्रेम मन से
इस पे भी ध्यान तू धर।
Surinder kaur

ग़ैर के मायने

ग़ैर के मायने मुझे,कुछ अपने समझा गये।
उस पर सितम ये,आप करीब आ गये।

अरसे बाद महफ़िल लगी जब यारों की
यादें पुरानी भूल,तरक्कियां गिनवा गये।

इज्ज़त करते रहे ,जिनकी हम झुक कर
मालूम नहीं कैसे ,बन वो खुदा गये।

कहते थे जो ,साथ देंगे तेरा हम उम्र भर
वक्त पड़ने पर ,सब वो वादे हो हवा गये।

इतनी बेमुरव्वत होती जाती है ये दुनिया
सुलझाने की बात को लोग और उलझा गये।

सुरिंदर कौर