फासले बढ़ते गये

फासले बढ़ते गये, ऐसा कभी सोचा न था।
साथ था वो मेरे, लेकिन मेरा अपना न था।

रूसवाईयां तो बहुत दी ,तेरे इश्क ने मुझे
ये दिल की लगी थी ,तभी कोई गिला न था।

बहुत आसान था, तेरे लिए भुलाना मुझको
मेरे लिए ये मगर,इतना कभी आसां न था।

टुकड़े टुकड़े हो गये खुद को तराशते हम
बन पाता किसी का खुदा, मैं ऐसा पत्थर न था।

लौट कर न आयेंगे,न उम्मीद कोई रखना तू
पहुंच पाए तुम तक,ऐसा कोई निशां न था।
सुरिंदर कौर

बिखरी रेत से हम

साहिल पर बिखरी रेत से हम
समुद्र साथ बहता है।
मगर प्यास जन्मों की समेटे
हुये ये रेत।
उसके दामन में बस नमी।
वो भी थोङी सी ।
इतनी कि लोग रेत के घर
बनाते है ।
पल दो पल टिकते है
बस
रेत की प्यास उजागर होते ही
धराशायी हो जाते है
ये दरो दीवार।
एक सपने के जैसे

Kaur Surinder

कभी कभी

कभी वो वक्त भी आता है
साया भी साथ छोड़ जाता है
जिसको देख कर हम जीते हैं
वहीं मौत हमें दे जाता है

कभी दुख के बादल घिर जाये
कभी मन अपना हर्षाता है।
कभी तरसे कोई पाई पाई को
कभी छप्पर फाड़ दे जाता है

कभी मन खुश हैं तनहा तनहा
कभी महफ़िल में शरमाता है
कभी इंसा को इंसा नहीं माने
कभी एक शख्स खुदा हो जाता है

सुरिंदर कौर

सोचा था हमने

सोचा था हमने ,एक जख्म हैं भर जायेगा।
हैरां हूं कैसे ,एक शख्सं,तन्हा कर जायेगा।

दो मुलाकातों में कोई अपना नहीं हो जाता
कैसे कह दें ,वो मेरे दिल में उतर जायेगा।

अपनी नाकामियों से सीखोअब तो कुछ
वक्त कैसा भी हो, आखिर गुजर जायेगा।

किस के भरोसे छोड़ें हम ये घर आंगन
क्या पता , कौन मुसाफ़िर ठहर जायेगा।

शजर उदास है ,परिंदे अब क्यों नहीं आते
क्या जाने कब क़ैद उनको कोई कर जायेगा।

बहुत हल्के में लिया था मैंने उसका जाना
क्या पता था बिछड़ना ,कर कहर जायेगा।

रात आई है तो मीठे सपनों में खो जा तू
अंधेरा घना आखिर ,कर के सहर जायेगा।

सुरिंदर कौर

यादों के सहारे

कहां चलती है जिंदगी, यादों के सहारे।
ग़म है ,कुछ ले देकर भी वो हुए न‌ हमारे ।

जीवन है तो यकीनन,भूख प्यास भी होगी
रख दिल में तुम्हें ,दिन हम कैसे गुजारें।

सिर्फ तेरा हूं , सिर्फ दिल मेरा मानता है
बेटा, पति पिता भी मेरे किरदार है सारे।

बहुत मुश्किल है ,मुस्कराहट लबों पे रखना
किससे कहें ,हम तेरी यादों के हैं मारे।

पलकों के नीचे , अश्क अब जम से गये है
बहुत मुश्किल है जीना, यादों के सहारे।

सुरिंदर कौर

अपना मान कर

अपना मान कर तुमको ,कह दी दिल की बात।
बाद उसके ,कभी न हुई तेरी मेरी मुलाकात।

रूह की रहगुज़र पर ,फिर कोई निशां‌ न उभरा
जब से दिल तुझको ,दे दिया मान सौगात।

कुछ कड़वे,कुछ मीठे राज़ दफन किये दिल में
तब समझ में आई, मुझको अपनी औकात।

इतनी सीधी भी नहीं ये दुनिया,जो तुम सोचो
पल भर में दे देती है , आंखों में बरसात ।

हर जख्म सहना पड़ता है,हंस कर हमें ‌यहां तो
कौन ,कब , कैसे क्यों कर जाये विश्वासघात।

सुरिंदर कौर

अबोध बच्ची

ये घटना पंजाब के सुल्तानपुर लोधी की घटना है जो हुआ मैंने वहीं लिखने की कोशिश की है  सब कुछ लिख सकते हैं हम लेकिन किसी के दर्द की शिद्दत हम
अल्फाजो में बयां नहीं कर सकते

खेल रही थी मैं
अचानक से वो आया।
मुझ को चाकलेट दिखलाया।
भूखी थी ——तो ले ली चाकलेट।
सहलाने लगा मुझे
बिस्कुट खाओगी—–चल दी उसके साथ।
बिना कुछ बोले,बिना कुछ समझे
सात साल की अबोध तो थी
मगर————–+
जैसे ही खेत के पास पहुंचे
वो:::::::
वो जानवर बन गया।
जमीन पर पटका मुझे
और  मेरे कपड़े उतार करने लगा।
अपनी हवस पूरी:::;;;;
छोटी सी मैं, फूल सी
बहुत दर्द हुआ मां
सारा बदन छिल गया मेरा मा
मैंने पुकारा था तुम्हें और बाबा को मां
बहुत चीखी थी जब मैं
तो दबा दिया उसने मुंह——-
घुट कर रह गई मेरी चीख———–
टांगे तोड़ दी थी उसने
कैसी छूट कर भागती ।
मां बोलो तो——
पता नहीं फिर क्या क्या किया उसने—–+
मर जाती तो अच्छा होता,
लेकिन मरी नहीं मैं–+
काम से लौट मुझे ढूंढा होगा तुमने
बेहोश ,खून से सनी ,निढाल पड़ी थी मैं
अस्पताल ले गए
पुलिस केस बना।
मुख्यमंत्री ने घोषित किया इलाज का खर्च
सरकार करेगी।
इतनी इन्फेक्शन बढ़ गई कि
मेरी बच्चेदानी निकालनी पड़ी।
और फिर भी मैं #जिन्दा हूं।
क्र्यू नहीं जला दिया उसने मुझे मां
कम से कम दो चार दिन रोकर तुम
दिल पर पत्थर रख लेती।
अब तुम और मैं रोज मरेंगे।
सच कह रही हूं न मैं मां::::
मैं सात साल की अबोध बच्ची 
सुरिंदर कौर

फैसला करने से पहले

मुझ से पूछ तो लेते, फैसला करने से पहले।
मुझ को मुझ से ही ,अलहदा करने से पहले।

जिंदगी मेरी माना ,जुड़ी है तुमसे ही चार सु
हालात देख लेते, तस्करा करने से पहले।

फूल ही फूल खिले ,रूह की रहगुज़र पर
ज़रा सा सोच लेते,राबता करने से पहले।

इज्तिराब ए शौक की, क्या बात हम करे
खुशी से मर बैठे, मुलाकातां करने से पहले।

देखा है अजब ही ,दस्तूर तेरा मैंने ऐ खुदा,
छीन लेता है चाहतें,इत्तला करने से पहले।

सुरिंदर कौर

हैलो जिंदगी

जिंदगी क्या है।
हसी सा सपना है।
आंखें बंद हो तो,……सब अपना है
दामन भरा है।……सितारों से
चांद भी अठखेलियां कर रहा है।
आंख खुले तो …..जीने के लिए
रोज़ मरना।
दौड़ना पड़ता है….रूके तो लोग
पैरों तले रौंद कर बढ़ जाते हैं आगे।
जिंदगी सांसों का चलना नहीं,
जिंदगी खुद को साबित करना हैं
रूकोगे तो भुला दिये जाओगे
बीत गये वक्त की तरह।
जिंदगी जंग है
लड़ने के लिए।

सुरिंदर कौर

जीवन की मधुशाला

जीवन की मधुशाला में, ऐसे कड़वे घूंट पीये।
कभी हंस दिये खुद पर,कभी रो रोकर जिये।

हर शख्स हम को,समझा कर चलता गया।
समझना हमको ,हर बार ही टलता गया।

तूफान तेरे जिंदगी ,जैसे तैसे हम सह गये।
जाते जाते जो *डटे रहो कान में कह गये।

कैसे कैसे रंग हमें,दिखला गयी ये जिंदगी
कौन अपना नहीं , समझा गयी ये जिंदगी।

मौत तो आनी है,एक दिन तो वो आयेगी
रोज़ मरना और मरना जिंदगी कहलायेगी।

सुरिंदर कौर